सर्कस – रोज जिंदगी और मौत से खेलते यह सर्कस के कलाकार

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दो वक्त की रोटी इंसान को क्या से क्या बना देती है किसी को जो कर बना देती है किसी को मेंढक बना देती है किसी को कार्टून बना देती है रोज जिंदगी और मौत से खेलते यह सर्कस के कलाकार बेरोजगारी दो वक्त की रोटी के खातिर अपने परिवार को पालने के लिए एक टेंट के अंदर अपना जीवन अपना परिवार सब कुछ मान कर यहीं से जीवन शुरू करते हैं और यहीं पर शायद कभी इस शहर में कभी उस शहर में ना कोई घर ना कोई ठिकाना एक मुसाफिर जैसा जीवन जीना इन कलाकारों का होता है कोई मां को छोड़कर कोई मां बाप को छोड़कर कोई भाई बहन को छोड़कर दो वक्त की रोटी के लिए मौत के झूले पर झूलते हैं यह कलाकार खुद दुखी और परेशान बाकी चंद पैसों के लिए लोगों का मनोरंजन करना और उन्हें हंसाना और खुद करना इनके जीवन का उपदेश है जहां प्रदेश सरकार ने इनके जानवर छीन कर इनका धंधा चौपट कर दिया है इनके जानवर आज चिड़ियाघर की शोभा बने हुए हैं आज गिने-चुने ही सर्कस हमारे देश में बचे हैं एक टेंट के अंदर कहीं प्रदेश के कलाकार परिवार के रूप में रहते हैं

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