कितना समझा है स्त्री को ?

कितना समझा है स्त्री को ?
सिर्फ इतना ही न कि
वह रूप है , देह है , आनंद है
सुंदरता है , साधन है लेखन का

क्यों नहीं जान सके कि
स्त्री ही सनातन है और प्रकृति भी
उसमें समाहित है कोरे हो जाने का गुण
लिखने के लिए नई जीवंत कविता

स्त्री ने ही सिखाया है प्रेम
स्त्री ने ही सिखाया है त्याग , और
स्त्री ने ही सिखाया है विश्वास
स्त्री ने सिखाया है धैर्य और धर्म
स्त्री ने सिखाया है जीवन अंकुरण

नयन नक्श , लोच, कमनीयता
सुंदरता, हँसी और शृंगार
ये सब मात्र अंग हैं स्त्री के
ये सब कभी भी नहीं हैं
सम्पूर्ण स्त्री ,
हमें अभी सीखना होगा देखना

ममत्व और स्वत्व से दूर
किसी ऋषि सी साधना है स्त्री
ममत्व को पिलाती माँ है स्त्री
जड़ों से कटकर जड़ जमाती
अकूत संभावना है स्त्री

संकल्प की अधिष्ठात्री है स्त्री
कमनीयता देह की नहीं वरन
जुडने की है स्त्री होना
कोमलता अपनाने की है स्त्री
समर्पण की संपूर्णता है स्त्री

विधाता के नमन का प्रसाद है स्त्री
कलुषित मना का काल है स्त्री
स्त्री बसंत है तो महाकाल है स्त्री
जीवन कुन्दन करने वाली ज्वाल है स्त्री

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