क्या होता है धर्मनिरपेक्षता का मतलब?

क्रांति न्यूज, ब्यूरो प्रमुख—–कवि अनिरुद्ध कुमार सिंह गाजियाबाद । आजकल विपक्षी पार्टी के नेता राष्ट्रीय नागरिक संशोधन अधिनियम को धर्मनिरपेक्षता के आधार पर विभाजनकारी और भेदभाव से परिपूर्ण बता रहे हैं । लेकिन दुःख की बात तो यह है कि विपक्षी पार्टी के एक भी नेता को- क्या होता है धर्मनिरपेक्षता का मतलब पता नहीं है ? धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह नहीं है जैसे विपक्षी पार्टी के नेता सोचते हैं । धर्मनिरपेक्षता का सही मतलब यह है कि जिसे धार्मिकता के आधार पर पड़ताड़ित या अपमानित किया गया हो , उसे मानवता के आधार पर सुरक्षा और रहने की व्यवस्था करते हुए भारत की नागरिकता प्रदान करना । अगर गहराई से विचार किया जाए तो पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान में धार्मिकता के आधार पर गैर-मुसलमानों को बहुत पड़ताड़ित किए गए हैं ।उन पड़ताड़ित धर्म के लोगों को ( जो गैर- मुसलमान भारत में 31दिसमबर,2014 तक आ चुके हैं।) भारत की नागरिकता दिए जायेंगे । लेकिन पड़ोसी देश के मुसलमानों को भारतीय नागरिकता प्रदान नहीं किए जायेंगे क्योंकि उन्हें धर्म के आधार पर पड़ताड़ित नहीं किए गए हैं । विशेषकर रोहिंग्या मुसलमान और अन्य मुसलमान जो धार्मिक पड़ताड़ना के शिकार नहीं हुए हैं और पड़ोसी देश से घूसपैठी बनकर अवैध तरीके से भारत में रह‌ रहे हैं, उन्हें भारत की नागरिकता नहीं दिए जायेंगे क्योंकि वे सब यहां रह कर आतंकवादियों को सहयोग कर देश के लोगों को भारी क्षति करते हैं । अतः वैसे लोगों के धर्मनिरपेक्षता के ओट में भारत की नागरिकता नहीं दिए जायेंगे ।जो नेता पड़ोसी देश के मुसलमानों को भारतीय नागरिकता देने के पक्ष में हैं, वे सबसे ‌पहले भारत की जनता को बताएं कि उनके उपर कहां और किसने धर्म के आधार पर पड़ताड़ित किए हैं? पाकिस्तान, बंगलादेश, अफगानिस्तान, श्रीलंका और म्यांमार में धर्म के आधार पर पड़ोसी मुसलमानों के उपर कोई संकट नहीं है तो विपक्षी पार्टी के नेता राष्ट्रीय नागरिक संशोधन अधिनियम को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर क्यों बदनाम करने पर तुले हुए हैं? आपके धर्मनिरपेक्षता का यह मतलब कतई नहीं है कि पड़ोसी देश के मुसलमानों को बिना आधार और अधिकार के भारत की नागरिकता दे दिए जाएं। यहां भारत की धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह है कि जो धार्मिक पड़ताड़ना के शिकार हो, उसे हीं मानवता के आधार पर भारत की नागरिकता दी जाएगी । ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय नागरिक संशोधन अधिनियम में विभाजनकारी और भेदभाव की बातें तो दूर तक भी नहीं दिखाई पड़ता है, तो आपको यहां भेदभाव कैसे दिखता है ? आप थोड़ा- सा प्रतीक्षा कर लीजिए और देख लीजिएगा 22 जनवरी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला, तब आप समझ जाएंगे कि सही-गलत क्या है?

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