डर कर नहीं ,डराकर नहीं चलें कभी किसी को ठुकराकर नहीं

डर कर नहीं ,डराकर नहीं
चलें कभी किसी को ठुकराकर नहीं |
अपना बनाने की जिद करो
पर किसी को हराकर नहीं |
खुद हारकर ही खुदा को जीता है
जिद्द टार कर ही भँवरा फूलों का रस पीता है |
मँडराता है कलियों पर ,गुनगुनाता है आसपास
पंखुड़ियाँ खुल जाने तक न जाने कितना रिझाता है
थकता नहीं ,गाता ही जाता है मीठे राग
कभी मिल जाता है ,कभी मिलता नहीं पराग
रहता है फूलों में ,खाता है पराग
पर ख्याल रखता है लगे न इसमें कोई दाग
फूलों के खिलने मे अपनी भूमिका से अंजान
न जाने क्या गुनगुनाता है ,किसका करता है गुनगान
फूलों को कैसे अपना बनाता ,कैसे कर लेता है रसपान
अपना बनाने की कला पर उसे शायद नहीं अभिमान |

kranti news with Krishna Tawakya Singh

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