क्या दस्खत दूँ तुम्हे अपने वजूद का दोस्त किसी के जहन मे जाऊं और वो मुस्करा दे यही काफी है

kranti news beauro :- बर्तमान परिवेश, तरक्की करता देश, तथा फैसन परस्ती के समावेश मेंअपनी पुरातन सभ्यता के वजूद को मिटाते हुये सब कुछ बर्बाद करने के रास्ते पर चल पङा है।पाश्चात्य सभ्यता की नकल कर आज की युवा पीढीअपने को उन्नत शील प्रगतिशील मान रही
है।शहरों में तो पाश्चात्य शैली से जीवन जीने की परम्परा घर कर कर गयी ,लेकीनअब उसका भरपूरअसर गाँव देहात में भी बखूबी देखने को मिल रहा है। एकाकी जीवन, अधनंगा परिधान, न किसी से मतलब नअपनो का सम्मान, न पूजा न पाठ ,पाश्चात्य गीत पर थिरकते पांव? हर तरफ देखने को मिल रहा है बदलता वक्त बदलता गाँव। फैसन परस्ती के जनून में सब कुछ बर्बाद हो रहा है।घर परिवार मे प्रचलन मेअपना वजूद कायम कर लिया है। देह ऊघारू बस्त्र आधुनिकता कीपहचान बन गया है।निर्लज्जता की पराकाषाठा न बङा न छोटा न माँ न बाप किसी से नहीं वास्ता?।कपङो के बीच से झलकती नंगी शरीर?कुशाग्र तकदीर का सिम्बल बन रहा है। ऐङवान्स होने का दम्भ लोग भर रहें है।न शर्म है न शर्म के मर्म की जानकारी है बर्तमान में बेशर्मी सब पर भारी है।तो पुराने जमाने की आखिरी पीढी जोअब समापन के करीब है उनके मुख यह सब देखकर बरबस ही निकल जा रहा है।ए दौरे तरक्की है, या दौरे तबाही है,
कि कपङो के दरीचों से बदन झाँक रहे है,।इस दौर में देश की युवा पीढी तेजी से पाश्चात्य सभ्यता की नकल कर अपनी सनातनी भारतीय परम्परा को दरकिनार कर रही है।अब न संस्कार है न बिचार है,न सन्तुलित आहार है।,फास्ट फूङ, नकली दूध,कर्ज लेकर भर रहा है आज की युवा पीढी सूद,।? न खेती न बारी,हर काम उधारी? सङको पर मारा मारी?बेतरतीब बाल पिचके हुये गाल शराब के नशे में
लङखङाती चाल, काम न धन्धा हर काम गन्दा? दिन भर करते रहते है बवाल,? माँ बाप पराया, प्रिय हो गयी है ससुलाल। ?बङो का तिरस्कार आशोभनीय ब्यवहार, अपनो से तकरार?बदलते युग का मूल मन्त्र बन गया है। महंगी बाइक की सवारी, शराब की खुमारी, घर परिवार से मारा मारी, परायी नारी ,फैसन परस्ती ,महंगे होटलो में मस्ती, बर्तमान समाज में तेजी से पांव पसार रही यह कुरीति अब जवानी पर है।कोई परिवार बाकी नहीं बचा जो इस बिनाश कारी पाश्चात्य सभ्यता की चपेट में न आ गया हो।?पहले घर मे नयें नये मेहमान के आने पर छठीहार होता था बधाईयाँ गायी जाती थी। गांव इलाके मे शोहरत फैलती थी खान, पान ,नहान, परिधान, सब कुछ सनातन ब्यवस्था के पोषक हुआ करते थे। परम्परा का हर धर्म मजहब निर्बाह करते थे। जन्म दिन पर कथा वार्ता भोज की परम्परा रही है।अब बर्थङे मनाया जा रहा है इंगलिस की जानकारी होने पर भी हैप्पी बर्थ ङे टूयू गाया जा रह है।अब न पंङित की जरूरत न मन्त्रोच्चार सब कुछ बदल गया सबका बदल गया ब्यवहार।यूँ तो इस परिवेश को तरक्की का ही कहा जा रहा है लेकीन जो गिरावट आयी है। जिस सामाजिक मर्यादा का रोज हनन हो रहा है यह निश्चित रूप से आने वाले कल में कलंकित प्रदूषित समाज के निर्माण के लिये नींव का पत्थर साबित होगा।
कहा गया है जिस परिवार को जिस देश को बर्बाद करना हो उस घर उस देश की संस्कृति परम्परा को बर्बाद कर दो,।?आज हम
उसी राह पर चल पङे है। बेपर्दा होती औरत ,खतम होती गैरत? गायब होती सामाजिक समरसता बच्चो केआगे बढती बिवसता? अन्दर ही अन्दर आपस में बढ रही नफरत इन सबका समावेश बरबाद कर देगा देश?।ब्यवस्था के बवंङर में समय का चक्र गतिमान है।बर्बादी के तरफपुरानी ब्यवस्था पुरातन स्वाभिमान है फीर भी तरक्की कर रहा हिन्दुस्तांन है।कल किसने देखा है मगर भयावह मंजर का निर्माण कर रहा बर्तमान है।बदलते युग मे रोजाना सामाजिक वातावरण बिषाक्त हो रहा है।इस परिवेश में चीर हरण तो हर परिवार का होना है? सबको रोना है? क्यो की अब सामाजिक ढाचा चरमरा रहा है संयुक्त परिवार समापन के कगार पर है। घर का मुखिया दुखीया बन गया।अब न कोई आह है न चाह है सबकी अपनी अपनी राह है। समय का समन्दर हिलोरे मार रहा है परिवर्तन नर्तन करता चला आ रहा है। बिघटन सिहरन पैदा कर रहा है।आने वाला कल बिकल भाव से बदलाव की ईबारत लिखने को आतुर है। देखते जाईये समय क्या क्या गूल खिलाता है।
जयहिन्द🇮🇳 🙏🙏
जगदीश सिंह पत्रकार

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