जब दिल में तमन्ना थी, अब दिल ही तमन्ना है!

kranti news editor desk :- खुले मन से””

बशीर बद्र साहब का शेर है-
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं।
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में ।।

दिल को दिल बनाए रखने के लिए लोग क्या नहीं करते। कुछ दिन पहले रूस का एक विडियो देखा। वहां के रेलवे स्टेशन पर वेंडिंग मशीन के सामने खड़े होकर तीस उठक-बैठक करने पर मुफ्त टिकट मिलता है। वहां की सरकार चाहती है कि लोग वर्जिश करें, ताकि सेहतमंद रहें। खासतौर पर दिल। वैसे, दिल को दिल बनाए रखने का ऐसा ही एक नजारा कुछ साल पहले इस नाचीज ने पैरिस में देखा था। वहां मोबाइल चार्ज करने के लिए साइकलें थीं। लोग फिक्स साइकल पर जितनी देर पैडल घुमाते, उनका मोबाइल उतना ही चार्ज हो जाता। ये सारे तरीके वहां लोगों को कुदरती तौर पर चुस्त-दुरुस्त बनाए रखने के लिए हैं।

अब अगर अपने देश की बात करें तो लोग 500 मीटर की दूरी भी बिना स्कूटर, मोटरसाइकल या कार के तय नहीं करना चाहते। घर से 300 मीटर की दूरी पर एक स्कूल है। पड़ोस में रहने वाले बच्चे के पिता रोजाना उसे कार से छोड़कर आते हैं। साधन संपन्न लोगों की अपनी समस्याएं होती हैं। इनके पास या तो बहुत वक्त होता है या बिल्कुल नहीं। मसलन, हाथ में मोबाइल फोन है तो बेमकसद ही विडियो देखते जाएंगे, सोशल मीडिया पर ज्ञान उलीचेंगे या फिर गेम खेलने लग जाएंगे। यही महाशय जब सड़क पर बाइक या कार चलाएंगे तो 200 मीटर घूमकर यू-टर्न लेने की बजाए रॉन्ग साइड से सड़क पर जाना पसंद करेंगे। वह भी ऐसे देश में, जहां हर चार मिनट में एक आदमी रोड एक्सिडेंट में मरता है। कुल मिलाकर न तो सेहत हमारी प्राथिमकता है और न ही जान। बच्चे, बूढ़े और जवान सब इसके शिकार हैं। आम हिंदुस्तानियों की इन्हीं प्रवृत्तियों का बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स और कंपनियों ने बारीकी से अध्ययन किया है। इन आदतों का भुगतान हमें-आपको बड़े प्राइवेट अस्पतालों में करना पड़ता है। जरा से दर्द में लंबा बिल कैसे बनाया जाए, इसकी विशेषज्ञता होती है यहां के डॉक्टरों की।
कुछ दिन पहले एक हार्ट सर्जन से मुलाकात हुई। पुराने वक्त के भले आदमी हैं। नए जमाने के कॉरपोरेटी छल-प्रपंचों से अब तक बचे हुए हैं। देश के कई बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों ने उन्हें बुलाया, बड़ी रकम ऑफर की पर उन्होंने जॉइन नहीं किया। कारण पूछने पर उन्होंने चौंका देने वाली जानकारी दी। उनके मुताबिक, प्राइवेट अस्पताल अगर दो करोड़ रुपये का पैकेज देते हैं तो चार करोड़ रुपये कमाने का टारगेट भी। बड़ी-बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने जांच की मशीनें बनाई हैं, उनका लगातार चलना जरूरी होता है। अगर उनके लिए रोजाना केस नहीं आएंगे तो करोड़ों का खर्चा नहीं निकलता। लिहाजा, जहां एंजियोप्लास्टी या एंजियोग्राफी की जरूरत नहीं भी होती, वहां भी इन्हें करवाना डॉक्टर की मजबूरी होती है। उसे भी टारगेट पूरा करना होता है। कई बार डॉक्टर अच्छी तरह से जानता है कि सीने में उठ रहे दर्द के पीछे एंजाइना नहीं बल्कि गैस है। साधारण गोलियों और खान-पान बदलने से ही इसे ठीक किया जा सकता है। इसके बावजूद ऐसे केस तक में स्टेंट डाल दिए जाते हैं। डॉक्टर साहब से इलाज की हकीकत सुनी तो रूह कांप गई। अस्पतालों को अब मैनेजर चला रहे हैं। उनकी अपनी मजबूरी है, प्रॉफिटेबिलिटी। साल दर साल आमदनी बढ़े। इतना तकनीकी क्षेत्र है कि आम लोग समझ भी नहीं सकते कि डॉक्टर की सलाह सही है या गलत। फिर इससे बचे कैसे। बचने का एक ही तरीका है जिंदगी के तौर-तरीके बदलना। स्वस्थ सोचिए, स्वस्थ रहिए और सेहतमंद रहने के लिए मेहनत कीजिए। दिल ठीक जगहों पर लगाइए। दौड़िए, घूमिए, गाइए और नाचिए, योग करिए। बहुत से तरीके हैं दिल को बचाए रखने के। घर का बना खाइए। गेहूं-चावल के अलावा दूसरे अनाज भी हैं, जिन्हें खाकर दिल ज्यादा सेहतमंद रह सकता है। इसे समझिए, जो भी कीजिए पर अपना रास्ता ठीक रखिए। जिगर मुरादाबादी के इस शेर को समझिए और दिल को संभालिए-

आग़ाज़-ए-मोहब्बत का अंजाम बस इतना है।
जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है।।

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