बात यहीं आकर रूक जाती है न हम कभी एक थे न एक होंगे

बात यहीं आकर रूक जाती है न हम कभी एक थे न एक होंगे
नारे बहुत लगाए जाते हैं एकता के
पर सबकुछ दिखावटी है |
एक झोंका आता है
चादर उड़ा ले जाता है
दिख जाती हैं दरारें
जो हमारे बीच हमने बनायी है .
इंसान को हिन्दु और मुसलमान बनाकर
अलग अलग पोशाक ,और अलग तहजीब दिलाकर
उन्हीं तहजीबों का यह नतीजा है
वो कहते किताबों में लिखा है
क्या पाप ,क्या पाक है
हमें सब बेकार लगा
दिल के सिवा कुछ भी नहीं पाकीजा है |
दिलों के बीच न जानें इन्होंने कितनी दीवारें खड़ी कर दी हैं
बाँधने को इंसान को
न जाने कितनी जंजीरें बनायी गयी हैं |
ये जंजीरें ,ये दीवारें आज टकराने लगी |
इंसान के पास आते ही वास्ता इनसे पड़ता है |
दिल तो घुटता है ,इन दीवारों की टकराहट से
कौन मुक्ति दिलाएगा
इंसान को इस छटपटाहट से
गरीब क्यों उठकर तलवारें भाँजने निकल पड़ता है |
क्यों वह बार बार उनकी बातों में आकर जान गँवाने को तैयार हो जाता है |
उनके नाम के नारे लगाता हुआ .
अपनी गरीबी भूलकर सड़को पर उतर आता है |
और फेंकने लगता है पत्थर
तो कभी किसी की झोपड़ियाँ जलाने लगता है |
क्या उसे पता नहीं गरीबी का दर्द
सबकुछ क्यों भूल जाता है
जब उन्हें आवाज देनेवाले
खुद को बताते हैं खुदा का अर्ज |

Krishna Tawakya Singh with kranti news

Translate »
क्रान्ति न्यूज - भ्रष्टाचार के खिलाफ क्रांति की मशाल