आप बुर्के में कैद मैं जनेऊ से बँधा हूँ

आप बुर्के में कैद
मैं जनेऊ से बँधा हूँ
न मैं इंसान ,न आप रहे इंसान
हम हिंदु ,आप मुसलमान
हम अंधे हैं
दिलों को देख नहीं सकते
कहाँ मिलते हैं
मन्दिर और मस्जिद के रास्ते
हम पूरब की ओर मुँह करते
आप पश्चिम की तरह मुँह फेरते
न मुझे कहीं अल्लाह मिला
न आपको ईश्वर से कभी भेंट हुई
हम ऐंठते रह गए
उल्टी मुँह फेरकर
आपको पता नहीं
कब बैशाख ,कब जेठ हुए |
आप दरगाहों में भटकते रहे
हम देवी देवताओं की पिंडियाँ स्थापित करते रह गए |
न आप मेरे यहाँ आए
न कभी हम आपसे मिले
बड़े हैरत से देखा
एक दूसरे जब हमारे नैन मिले |
चाहते थे एक दूसरे को झुकाना
हम बड़े हैं तुमसे ,यही था दर्शाना
न हम आपको बड़ा मानने को राजी हुए
न आपने मुझे बड़ा माना
यही लड़ाई चलती रही
अबतक तनी हैं तलवारें
जो उस वक्त हमदोनों ने ताना |

kranti news with Krishna Tawakya Singh

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