क्षत्रिय देश के रक्षक एवं महान् शासक थे । इस समाचार के बारहवें भाग यहां से पढ़िए:—

kranti news ghaziabad ,( beauro chief ) kavi anirudh kumar singh :-गाजियावाद । आप सभी ने बारहवीं भाग के पूर्व में पढे थे कि सूर्पनखा ने रावण से बताये बिना हीं श्री राम से प्रेम विवाह कर ली थी , जिससे वह (रावण) बहुत हीं क्रोधित हुए । इसके बाद आप इस भाग में यह पढ़िए कि रावण ने सूर्पनखा को अपहरण कैसे किया ? जब सूर्पनखा ने श्री राम से शादी कर ली,तब वह शादी के पश्चात रावण से मिलने नहीं आती थी । इधर रावण ने अपने गुप्तचरों से पता किया, तब उसे पता चला कि सूर्पनखा श्री राम जी से प्रेम विवाह करके उनके साथ रहने लगी है । इसके बाद रावण ने आवेश में आकर अपने सैनिकों को आदेश दिया कि जाओ, सूर्पनखा सहित सभी को जीवित हीं पकड़कर मेरे सामने हाजिर करो । कौन है वो, जो विश्व विजयी रावण के बहन के साथ प्रेम विवाह करने का दुस्साहस किया । मैं उसे शादी करने का मजा सीखाऊंगा । लगता है कि वह दुष्ट मेरे शक्ति से परिचित नहीं हैं । सूर्पनखा को भी मैं उसके पति जैसा हाल करुंगा ।वह जब रावण की नहीं रहेगी, तो उसे राम का भी नहीं रहने दूंगा ।जाओ,उन सभी जैसे भी, अभी पकड़कर मेरे सामने हाजिर करो । तब रावण के सैनिकों ने श्री राम से युद्ध करने के लिए चल दिए,तब श्री राम ने रावण के आये हुए सैनिकों को देखकर अकेले हीं अनेक सैनिकों को मार गिराए । अपने मरते सैनिकों को देखकर सेनानायके भी अपने प्राण की रक्षा के लिए भागने पर मजबूर हो गए । इसके बाद रावण के सैनिक कमांडर ने उनसे कहा कि राम को जीवित पकड़कर लाना बहुत हीं मुश्किल है महाराज । हम सभी ने बहुत मुश्किल से बचकर आपके पास आते हैं । मुझे लगता है श्री राम कोई साधारण व्यक्ति नहीं है । मुझे श्री राम को पकड़कर लाने के लिए कोई गंभीर उपाय करना चाहिए । तब रावण ने खर-दुषण को सैनिकों के साथ श्री राम जी से युद्ध करने के लिए भेजा, परंतु श्री राम ने अकेले ही खर-दुषण सहित सभी सैनिकों को मार गिराए ।जो सैनिक बचे,वे सब रावण के पास जाकर कहा कि हे महाराज श्री राम बहुत हीं शक्तिशाली है । श्रीराम ने अकेले हीं अनेक सैनिकों को मार गिराए और खर-दुषण को भी वध कर दिए । तब सभी बातों को सुनकर रावण बहुत हीं सोच में डूबा गया और मन-ही-मन कहने लगा कि खर-दुषण तो मेरे समान बलवान था, जिसे राम ने मार दिए । ऐसा काम तो भगवान के अलावा कोई भी नहीं कर सकता है । इस संबंध में गोस्वामी तुलसीदास जी ने मुद्रित मानस में लिखा थे कि कर दुषण मोहिं हम बलबंता,मार न सकहिं बिनु भगवन्ता । अर्थात खर-दुषण मेरे समान बलवान था, जिसे भगवान के बिना कोई दूसरा नहीं मार सकता है । इस अंक का तेरहवीं भाग में आगे की बात पढ़ेंगे —————————— जय, जय, जय श्रीराम ।

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