film-review : दबंग 3, चुलबुल पांडे की इस वापसी के लिए ‘स्वागत नहीं करेंगे तुम्हारा’ कहने का मन करता है

kranti news desk review :-

निर्देशक: प्रभु देवा

कलाकार: सलमान खान, सोनाक्षी सिन्हा, अरबाज़ खान, सुदीप

रेटिंग: 1.5/5

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दबंग सीरीज की पहली फिल्म साल 2010 में आई थी जिसका निर्देशन अभिनव कश्यप ने किया था. कॉमिक कॉप चुलबुल पांडे से पहली बार मिलाने वाली यह फिल्म बेहद मनोरंजक और कई ट्रेंड सेट करने वाली थी. इसकी एक उपलब्धि यह भी रही कि इसने सलमान खान को बच्चों में खासा लोकप्रिय कर दिया. इसका असर हमें नोएडा के एक मल्टीप्लेक्स में देखने को मिला जहां शुक्रवार सुबह के पहले शो में लगभग आधा थिएटर बच्चों से ही भरा हुआ था.

इस फिल्म की दूसरी कड़ी, ‘दबंग-2’ साल 2012 में रिलीज हुई. इसका निर्देशन अरबाज़ खान ने किया था. यह पहली फिल्म जितना मनोरंजन तो नहीं कर पाई लेकिन उसकी लोकप्रियता को इसने खूब भुनाया और बॉक्स ऑफिस पर उतनी ही सफल भी रही. और अब, सात साल बाद चुलबुल पांडे ने फिर स्क्रीन पर वापसी की है और इस बार निर्देशन की डोर कोरियोग्राफर-डॉयरेक्टर प्रभु देवा ने संभाली है. लेकिन अफसोस इस वापसी में कुछ भी नया और अनोखा नहीं है.

कहने को तो ‘दबंग 3’, दबंग सीरीज की फिल्मों का सीक्वल है लेकिन फिल्म का एक बड़ा हिस्सा इसके प्रीक्वल जैसा है. यानी वह दबंग के पहले की कहानी दिखाता है. यहां पर आपको पता चलता है कि चुलबुल पांडे अपना चश्मा कॉलर में पीछे की तरफ क्यों लगाते हैं, उनके कुछ आइकॉनिक संवादों का सोर्स क्या है, और यह भी कि रज्जो से पहले भी उनकी कोई प्रेमिका थी. जाहिर सी बात है कि इनमें से ज्यादातर बातें पिछली फिल्मों से कनेक्शन दिखाने और नॉस्टैल्जिया जगाने के उद्देश्य से ही यहां रखी गई हैं. लेकिन बुरा यह है कि फिल्म में केवल ये चीजें ही मज़ेदार लगती हैं. दबंग सीरीज की पिछली फिल्मों की शासियत उनके मज़ेदार आइकॉनिक संवाद, अलबेले किरदार और गुदगुदाने वाले सीक्वेंसेज थे. लेकिन ‘दबंग-3’ ऐसा कुछ भी फिर से रच पाने में बुरी तरह से नाकामयाब रहती है.

फिल्म अगर कहीं पर थोड़ा प्रायोगिक या नई होने की कोशिश करती भी है तो लापरवाह लिखाई की भेंट चढ़ जाती है. इसके लिए फिल्म के उस एक दृश्य का जिक्र जरूर किया जाना चाहिए जिसमें चुलबुल पांडे दहेज लेने के बजाय दहेज देने और अपनी भावी पत्नी की पढ़ाई का खर्च उठाने की बात करता है. यह दृश्य अपने अनोखे-चटपटे संवादों से आपको प्रभावित करने ही वाला होता है कि अगले ही पल चुलबुल खुद को उसका रखवाला घोषित कर इसे फिर माचो हीरो और शर्मीली हीरोइन वाली फिल्म बना देता है. इसी तरह के कई दृश्य फिल्म में हैं जो थोड़ा समझदारी से लिखे जाते तो ठहाके भले न लगवा पाते, लेकिन एक बढ़िया बात तो कह ही सकते थे. कलम की कामचोरी की यह शिकायत फिल्म के संवादों के लिए भी की जा सकती है जो सही पंच और फिनिशिंग ना मिलने के चलते औसत के नीचे ही रह गए हैं.

अभिनय की बात करें तो यहां पर भी सलमान खान हमेशा की तरह खुद की ही भूमिका में हैं. इस फिल्म में उनके साथ बुरा यह है कि चुलबुल के किरदार के लिए उन्हें जितना एनर्जेटिक और फिट दिखना था, वे उतने नहीं नज़र आए हैं. यही कारण है कि जब वे फिल्म के हर दृश्य में दिखते हैं तो उकताहट पैदा करते हैं और फिल्म की सबसे बड़ी खासियत के साथ-साथ इसकी एक बड़ी कमी भी बन जाते हैं. दुख की बात है कि यहां पर आपको वह सलमान खान नहीं दिखते हैं जिसके लिए दर्शक बिना स्क्रिप्ट के भी फिल्म देख सकता है. उनसे उलट, रज्जो बनी सोनाक्षी सिन्हा अपने किरदार को वहीं से शुरू करती हैं जहां पर उन्होंने ‘दबंग-2’ में उसे छोड़ा था. लेकिन उन्हें ज्यादा स्क्रीन स्पेस नहीं मिल पाया है.

दबंग-3’ से एक्टर-डॉयरेक्टर महेश मांजरेकर की बेटी सई मांजरेकर ने बॉलीवुड में डेब्यू किया है. फिल्म में चुलबुल की सीधी-सादी लजोड़ प्रेमिका बनकर सई स्क्रीन पर अच्छी तो लगती हैं लेकिन उनका काम अभिनय के पैमाने पर बहुत खरा नहीं कहा जा सकता है. इस फिल्म में अगर कोई अच्छा अभिनय करता दिखाई देता है तो वह फिल्म के विलेन ‘बाली’ यानी सुदीप हैं. लेकिन उनका अभिनय भी ‘मक्खी’ के उनके ऑब्सेस्ड प्रेमी वाले किरदार का दोहराव ही लगता है. फिर भी वे सलमान खान के स्टैंडर्ड फेस से थोड़ी राहत लेने का बढ़िया मौका तो दे ही देते हैं. इसके अलावा, यह कन्नड़ सुपरस्टार अपने स्टाइलिश लुक चलते भी कई बार हीरो पर भारी पड़ता दिखाई देता है.

निर्देशन की बात करें तो उत्तर प्रदेश के एक काल्पनिक कस्बे में स्थापित की गई इस फिल्म का निर्देशन दक्षिण भारतीय प्रभु देवा ने किया है. वैसे तो इस कॉम्बिनेशन के चलते दबंग 3 एकदम यूनीक कलेवर की फिल्म बन सकती थी. लेकिन यहां पर यह मेल क्रिएटिव डिजास्टर साबित हुआ है. इसका सबसे ज्यादा अंदाजा लोकेशन्स के चयन और संवादों की खराब कंटीन्यूटी से लगता है. इसके अलावा, बुरा यह भी है कि प्रभु देवा निर्देशित होने के बावजूद फिल्म में कहीं पर भी बढ़िया डांस देखने को नहीं मिलता है. ‘मुन्ना बदनाम’ आइटम गीत में जब सलमान खान कुछ अटपटी कोशिशें करते दिखते हैं तो लगता है कि यह कह दिया जाए – रहने दो, तुमसे ना हो पाएगा.

कुल मिलाकर, ‘दबंग-3’ में चुलबुल पांडे के चुलबुलेपन का जादू इस बार नहीं चल पाया है. इसलिए यह फिल्म आप दो ही सूरतों में देखिए. पहली यह कि आप सलमान खान के बहुत बड़े प्रशंसक हों. और, दूसरी यह कि आपको यकीन हो कि देश में एनआरसी लागू होकर ही रहेगा और सलमान ‘खान’ भी अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाएंगे, फिर उन्हें देश छोड़ना पड़ेगा और ऐसे में यह उनकी आखिरी फिल्म साबित हो सकती है.

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