लगता है सदियाँ गुजर गयीं तुझे देखे बिना |

लगता है सदियाँ गुजर गयीं
तुझे देखे बिना |
नहीं जानता अपनी पहचान कितनी पुरानी है |
इन नदियों में कितना पानी बह गया
हम जबसे किनारे पर खड़े हैं |
पर न तू बदली ,न मैं बदला
इस किनारे पर मैं खड़ा
तू भी उस किनारे पर ही खड़ी रही
न जाने कब से
हम दोनों एक दूसरे को देखते रहे
अनवरत ,एकटक
पर नदी के पार न हम हो सके न तुम
धारा को देखते रहे
जो बहे जा रही थी
समय के साथ साथ
पर हम न कुछ कह सके
न तुमसे कुछ गया है
रखी रह गयी अबतक
दिलों में वही बात |
जो न जाने कब से तुमसे कहना चाहता था |
अभी भी वही बातें मजबूर करती है
दिल में एक सुरूर भरती है
आ जाता हूँ मैं उसी नदी के किनारे पर
जहाँ से तुमहारी छवि नजर आती थी
पर अब वहाँ वीरान सा दिखता है
वही पेड़ ,उतनी ही झाड़ियाँ
बल्कि और उनकी संख्या में वृद्धि हो गयी है |
पर वहाँ तुम नहीं होती
पक्षियों का चहचहाना भी कम नहीं हुआ |
पर फिर भी अब वहाँ मन नहीं रमता
तेरे बिना अब मन में कोई गीत नहीं उभरता |
पानी की कल कल ध्वनि में अब वह संगीत नहीं सुनायी पड़ती |
अब मुझे देखने के लिए कोई खड़ी नहीं रहती | — kranti news with Krishna Tawakya Singh

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