किसानों की ओर से दो शब्द

गमले में मनी प्लांट लगाने वाले,खुद को किसान बताते हैं;
हम खेतों में मरते रहते,वो कुर्सी पर बैठकर खाते हैं।
गाड़ियों में घूमने वाले क्या जाने, हमारे खून पसीने की कीमत;
उन्हें गर्मी न लगे,ठंडक न लगे, ऐसा व्यवस्था करवाते हैं।
किसान भाइयों के साथ हूं मैं, क़तरा क़तरा कुर्बां कर दूंगा;
ये तसल्ली देकर जनता में, अधिकार का आग लगाते हैं।
सड़क जाम होती रहती है, भूख हड़ताल पे बैठी रहती जनता;
कहीं लाठी चार्ज, कंटीली तार, कहीं ठंडक से किसान मर जाते हैं।
पर इतने से मन भरता नही, गूंगी बहरी लंगड़ी सरकार का;
वो खाकर पेट बुलाते हैं, हम भूखे ही तडफड़ाते हैं।
जो अधिकार था सबका,अब वो भी नहीं मिलता सब को;
क्या करे जनता भी बेचारे, सरकार बनाकर ही पछताते हैं।
पर ये सिलसिला जारी है, रहेगा, आजादी के दशक से ही;
बात ये कभी शांति से, कभी तंग होकर आवाज उठाते हैं।
और जो कहते किसानों का औकात,फूटी कौड़ी के बराबर है;
कह दो ज्योति औकात न देखें, हमारे बदौलत ही तो खाते हैं।

ज्योति सिद्धार्थनगर

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