समझ नहीं पाता मैं कैसे तेरा शुक्रिया अदा करूँ |

समझ नहीं पाता मैं
कैसे तेरा शुक्रिया अदा करूँ |
ऐसे बुरे वक्त में भी
तूने साथ नहीं छोड़ा |
जबकि सब धीरे धीरे
साथ छोड़ते चले गए
पास आता देख
मुँह मोड़ते चले गए |
ऐसे में तुम्हारा प्यार
मेरे लिए एक संबल बना रहा
तेरी यादों में कहीं न कहीं
जिक्र हमारा रहा |
मैं कुछ कहूँ
उससे पहले ही तुम कह देते हो
बिना पूछे ही
समझ लेते हो मेरी तबीयत
क्या कहूँ इसे
दोस्ती या मोहब्बत
कुछ फर्क नहीं पड़ता
किसी संबोधन से
अपनापन का कोई नाम नहीं होता
रिश्तों के बँधन का कोई काम नहीं होता
जो स्वयं ही जुड़ जाते हैं
उसे नाम देकर जोड़ना क्या
हृदय की जमीन को
शब्दों से कोड़ना क्या
जड़े हैं मिट्टी के अन्दर
ये छुपी ही रहती हैं
इसे दिखाने की जरूरत नहीं
फूल लगे हैं
देखो पतझड़ के बाद
कितनी हरी हरी कोमल पत्तियाँ निकली है |
ये गवाह हैं ,हमारे रिश्ते के
तुम्हें जब से देखा
फिर कभी सपने नहीं आए फरिश्ते के | — kranti news with Krishna Tawakya Singh

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