क्यों मुझे हकीकत कहके रूलाते हो इससे तो अच्छा वो ख्बाब था

क्यों मुझे हकीकत कहके रूलाते हो
इससे तो अच्छा वो ख्बाब था
जिसे सुनकर हम ,
बँद होठों से ही सही
कम से कम मुस्कुरा तो लेते थे
जानते हुए कि यह झूठ है
फिर भी तुम दाँतो में ऊँगली दबा तो लेते थे |
फैल जाती थी एक आश्चर्य की लहरें
तेरे चेहरे पर ,
तेरी मुस्कुराहटों के आसपास
उन्हीं ख्बाबों को बुनते बुनते
न जाने तुम कब बन गए मेरे खास
आज हकीकत उन्हें भुलाना चाहती है
जो आँखें केवल हँसना जानती हैं
उन्हें रूलाना चाहती है |
तुम्हें मुझसे और मुझे तुझसे दूर ले जाना चाहती है |
दिल की गली से दूर
हमें दीवारों में चुनवाना चाहती है | — kranti news with Krishna Tawakya Singh

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