||क्या धर्म अपनी उपयोगिता खो रहे हैं ||

kranti news , Krishna Tawakya Singh :- वो डोर जो कभी दलदल से निकालने में काम आती थी |पेड़ों की टहनियों में बाँधकर झूला झूलने के काम नें आती थी, कुएँ से पानी निकालने के काम में ,और आसमान छूते दरख्तों पर चढ़कर फल तोड़ लाने में हमारी मदद करती थी और न जाने कितने काम होते थे | वह रस्सी पुरानी हो गई ,गल गई है ,थोड़े से खिंचाव में टूट जाती है | इसलिए वर्षों पहले उसे एक कोने में रख दिया गया है | अब तो वह इतना उलझ गया है कि खुलता भी नहीं |
यही हाल धर्मों का है ,वर्षों पहले अनुसंधान हुए | शब्द कहे गये अवतारों के मुख से ,वो धर्म बन गये |
अब वह स्थिर हो गया ,ग्रँथों मे बँद हो गया | उसे समझनेवाले रहे नहीं वाँचनेवाले अपने ढ़ँग और अपनी जानकारी के मुताबिक इसकी व्याख्या करने लगे |
इसके संबंध में आमजनों को बोलने से वंचित कर दिया गया और कुछ लोगों को इसकी व्याख्या करने और मनवाने की जिम्मेवारी दे दी गयी |
इसमें कोई नई खोज ,नये अनुसंधान का समावेश बँद हो गया | दुनियाँ बदलती गयी और वे वहीं पर रूक से गए |
बदलते वक्त ने व्यक्ति और धर्म को एक दूसरे से दूर कर दिया ,वह उसे समसामयिक नहीं लगने लगा और बँधन बनते गये |
जो कभी मनुष्य के विकास और फैलाव के माध्यम बने थे वो मनुष्य को जकड़ने लगे ,और सिकुड़ने के लिए मजबूर करने लगे |
जो मानव के मूल स्वभाव के बिल्कुल विपरीत लगने लगा | कुछ धर्मों ने तो यहाँ तक सीमाएँ बना दी कि जो कह दिया गया किसी अवतार के द्वारा वह अंतिम है और कुछ सोचने ,समझने और अनुसंधान की आगे न तो आवश्यकता है और न स्वीकार्य है | आपको इससे आगे सोचने की क्षमता नहीं है | और इस तरह मानव के सोच को भी सीमित कर दिया गया ,जिसमें इसलाम सबसे आगे रहा |
और आज इसी का परिणाम है कि इस्लाम धर्म का पालन करनेवाले अपनी कट्टरता और क्रूरता के लिए जितने बदनाम हैं उतना और किसी धर्म के अनुयायी नहीं है |
जड़ता तो हर किसी में आयी है | किसी में ज्यादा ,किसी में कम | धर्म जो मनुष्य को मुक्ति का मार्ग बतलाने और गतिशील बनाने ,वो अपनी भाषा में कहते हैं जगाने के लिए है वह अपना अभिप्राय खोता नजर आ रहा है |
़़़़़़़……जारी

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