धर्म और अधर्म क्या है? (प्रथम भाग)

क्रांति न्यूज चैनल, ब्यूरो प्रमुख-कवि अनिरुद्ध कुमार सिंह

. गाजियाबाद।दि०07/11/2020. आज के समय में सबसे ज्यादा चर्चित प्रश्न यह है कि धर्म और अधर्म क्या है? अगर इस प्रश्न का उत्तर पुराण से लेते हैं तो इस प्रश्न के उत्तर में महर्षि वेदव्यास जी ने कहा था कि”अष्टादश पुराणेषु , व्यासस्य द्वयं वचनं । परोपकार:पुण्याय पापाय परपीडनम । अर्थात महर्षि वेदव्यास जी ने अट्ठारहों पुराणों में सबसे महत्वपूर्ण दो बातें बताये थे। सबसे पहली बात यह कि परोपकार करना हीं पुण्य (धर्म) है। दूसरी बात किसी को अकारण पीड़ा (दु:ख) देना पाप(अधर्म) है। इसके बाद हम लोकनायक महाकवि गोस्वामी तुलसीदास के द्वारा रचित श्रीराम चरितमानस में देखते और पढ़ते हैं तो धर्म और अधर्म के संबंध में पुराणों से मिलती-जुलती बात है कि”परहित सरिस धर्म नहिं भाई,परपीड़ा नहीं सम अधमाई।”अर्थात परहित(दूसरों की भलाई) के समान धर्म और परपीड़ा (दूसरों की पीड़ा) के समान अधर्म नहीं है। धर्म और अधर्म के संबंध में कबीरदास जी ने कहा था कि”जहां दया तहां धर्म हैं, जहां लोभ तहां पाप। जहां क्रोध तहां काल है, जहां क्षमा तहां आप।”अर्थात कबीरदास जी कहते थे कि दया हीं धर्म है। इस प्रकार से यह बात साफ़ है कि धर्म और अधर्म की परिभाषा क्या है? लेकिन क्या आज हम सभी इस धर्म को जानते हुए भी किसी दूसरे को परोपकार कर रहे हैं? क्या हम आज दूसरे को खुशी देखना पसंद कर रहे हैं? क्या आज हम दुसरे को अपकार (बुराई) करने में नहीं लगे हुए हैं? क्या आज हम धर्म के नाम पर किसी दूसरे को धोखा नहीं दे रहे हैं? क्या हम प्रकृति के समान दुसरों की भलाई कर रहे हैं?जिस प्रकार से वायु, पेड़ – पौधे ,बादल, धरती, पहाड़, सूर्य, पहाड़ और नदियां दुसरों की भलाई करते , ठीक इसी तरह से क्याआज हम सभी दुसरों को भलाई कर रहे हैं? क्या इन सभी प्रश्नों पर आज के मनुष्यों को सोचने का समय है? गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस संबंध में श्रीरामचरितमानस में एक विशेष बात बताये थे कि”मात पिता बालकन बुलावहीं ,उदर भरे के धर्म सीखावहीं। अर्थात गोस्वामी तुलसीदास जी कहते थे कि कलियुग में माता-पिता अपने बच्चों से सिर्फ किसी प्रकार से उदर(पेट)भरने के हीं धर्म सीखाते हैं। यानी पेट पूजा हीं धर्म है। विशेष चर्चा बाद में पढ़िएगा।

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