रूस में फिर पुतिन विरोधी प्रदर्शनों का दौर, मॉस्को में निकला ‘रशिया मार्च’, 60 से ज्यादा गिरफ्तार

ताजा प्रदर्शनों का आयोजन नेशनल यूनिटी डे (राष्ट्रीय एकता दिवस) के मौके पर किया गया। हर साल 4 नवंबर को इस दिवस को मनाने की शुरुआत 2005 में हुई थी। इस दिन पूरे देश में छुट्टी रहती है…

पूर्व सोवियत गणराज्यों में आई जन विरोध की लहर अब रूस तक पहुंचती दिख रही है। पिछले दिनों बेलारूस, किर्गिस्तान और जॉर्जिया में हुए चुनाव के बाद बड़े जन प्रदर्शन हुए हैं। खास बात यह है कि उन सभी जगहों पर रूस समर्थक नेता दोबारा जीते। उन सब पर चुनाव में धांधली करने के आरोप लगे और उसके खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए।

दूसरी तरफ पूर्व सोवियत गणराज्य मोलदोवा में हुए पहले दौर के राष्ट्रपति चुनाव में रूस समर्थक नेता दूसरे नंबर पर रहे। पहले नंबर पर यूरोपियन यूनियन समर्थक नेता माइला सैंडू रहीं। अब आखिर दौर का मतदान 15 नवंबर को होगा। इस नतीजे को भी रूस के लिए चिंता की वजह बताया गया था।
इस बीच अब रूस में जन प्रदर्शनों का दौर आ गया है। बुधवार को राजधानी मास्को में राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के विरोधियों ने ‘रशिया मार्च’ निकाला, जिस दौरान 60 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया। रूस में पिछले काफी समय से पुतिन विरोधी अपने को संगठित करने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले अगस्त में विपक्ष के नेता एलेक्सी नावालनी को जहर देने की घटना हुई थी। उस मामले में भी शक की सूई पुतिन प्रशासन पर गई थी।
नावालनी को तब इलाज के लिए जर्मनी ले जाया गया। वे ठीक हो गए, लेकिन इस बात को लेकर रूसी विपक्षी ताकतों में नाराजगी है कि पुतिन प्रशासन ने उस घटना की ठीक से जांच नहीं कराई। जहर किसने दिया, इसकी पहचान आज तक नहीं हो पाई है।

ताजा प्रदर्शनों का आयोजन नेशनल यूनिटी डे (राष्ट्रीय एकता दिवस) के मौके पर किया गया। हर साल 4 नवंबर को इस दिवस को मनाने की शुरुआत 2005 में हुई थी। इस दिन पूरे देश में छुट्टी रहती है। इस दिवस को मनाने का मकसद देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देना और विभिन्न नस्लीय और जातीय समूहों के बीच मेलमिलाप को प्रोत्साहित करना है।

मगर इस बार इस दिवस को पुतिन विरोधी “राष्ट्रवादियों” ने विरोध जताने के दिवस में बदल दिया। मॉस्को के अलावा भी कई शहरों में इस मौके पर प्रदर्शन किए गए। इनमें शामिल लोगों ने पुतिन पर तानाशाही रवैये से शासन करने का आरोप लगाया।

पुतिन प्रशासन के अधिकारियों का आरोप है कि ऐसी गतिविधियों के पीछे अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों का हाथ है। उनके मुताबिक ये देश गैर-सरकारी संगठनों की आड़ लेकर रूस और उसके आसपास के देशों में अस्थिरता फैलाने में लगे हुए हैं। रूस की राय में बेलारुस में पिछले राष्ट्रपति चुनाव के बाद से जारी विरोध प्रदर्शनों के पीछे भी पश्चिमी देशों का ही हाथ है।

पुतिन लगातार अपने मित्र समझे जाने वाले बेलारुस के राष्ट्रपति अलेक्सांद्र लुकाशेन्को के संपर्क में रहे हैं। ऐसी भी खबरें बीच में आ चुकी हैं कि अगर वहां हालात बेकाबू हुए तो रूस अपनी फौज बेलारूस भेज सकता है। इन आरोपों पर यूरोपीय देशों में कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी।

कुछ रोज पहले ऐसी खबरें भी आई थीं कि यूरोपीय संघ नावालनी के मुद्दे पर रूस के खिलाफ कुछ नए प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक अब रूस के भीतर अगर प्रदर्शनों का दौर आगे और तेज हुआ, तो पश्चिमी देशों से पुतिन सरकार का तनाव और बढ़ सकता है।

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