क्या संविधान में ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द का मतलब नही !!!

आज हम दुनिया से आंख में आंख डाल कर बात कर रहे हैं, वह शक्ति और जज्बा हमें हमारी धर्मनिरपेक्षता से मिली

1947 में संघर्ष और बलिदानों के बाद एक स्वतंत्र बना

सदन में नागरिकता संशोधन विधेयक लाया गया। इस पर सदन में काफी तीखी बहस हुई और हंगामा भी हुआ। पर भारत के एक पंजीकृत नागरिक होने के नाते कुछ बातों पर गौर करना चाहिए। इस विधेयक को लाना जितना आसान था, उससे कहीं अधिक मुश्किल इसे पारित कराना और लागू करना है। जो हो, विधेयक कहीं न कहीं हमारे धर्मनिरपेक्षता और संविधान के मूल ढांचों पर एक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। अगर विवेक के साथ सोचा जाए तो कहीं न कहीं ये देश के दो धर्म विशेष समुदाय के बीच दूरियां बढ़ाने का काम करेगा।
विधेयक के प्रावधानों पर गौर किया जाए तो लगता है कि यह किसी खास धर्म वाले समुदाय को इसके दायरे से बाहर निकालने का प्रयास है। अगर इसे सदन से पास करा कर देश भर में लागू कर दिया जाए तो कहीं न कहीं यह हमारे राष्ट्रनिमार्ताओं की सोच, उद्देश्य, और उनकी कल्पना के भारत का गला घोंटना होगा। हम 1947 में काफी संघर्ष और बलिदानों के बाद एक स्वतंत्र देश बने और तुरंत हमारा विभाजन भी हो गया। हम धर्म की तलवार से दो भागों में बंट गए। अलग देश के सवाल के साथ पाकिस्तान बन गया और शेष भारत में हर धर्म के लोगों को रहने, अपना गुजर-बसर करने की आजादी मिली। ये बातें संविधान के मौलिक अधिकारों में भी कही गई है।

अब सवाल उठता है कि इस विधेयक में ऐसा क्या है जो हमारे मूल ढांचे पर असर डालता है?

अगर हम अपने पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को आसरा देकर भारत के नागरिक बना सकते हैं तो फिर बांग्लादेश ही क्यों? श्रीलंका के तमिल क्यों नहीं? उनके साथ भी तो वहां भेदभाव होता है! इस बात की क्या गारंटी है कि आज जो प्रयास एक समुदाय के साथ हो रहा है, वह भविष्य में किसी और समुदाय के साथ नहीं होगा? तब-तब हम नागरिकता संशोधन करके उस समुदाय को बाहर निकाल देंगे।
अगर देश को किसी खास धर्म का देश बनाना है तो फिर संविधान में ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द का कोई मतलब नहीं रह जाता है। हम शायद भूल रहे हैं कि अगर आज हम दुनिया से आंख में आंख डाल कर बात कर रहे हैं, वह शक्ति और जज्बा हमें हमारी धर्मनिरपेक्षता से मिली है। यह जिस दिन समाप्त होगी, भारत को दुनिया भर में एक कमजोर देश माना जाएगा। हमें याद रखना चाहिए कि कभी कि एक पंख से उड़ान नहीं भरी जा सकती है।

ajay thakur ( editor in chief )

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