मैं फेसबुक पर बीते सात साल से इस्लामिक कट्टरपंथ और आतंकवाद पर लिख रहा हूँ..

आप को नास्तिक और सेक्युलर कहने वाला लगभग हर व्यक्ति जो शुरू शुरू में मुझ से जुड़ा था, अब दूर हो गया है.. वजह ये है कि उन्हें लगता है कि मैं इस विषय पर ज्यादा लिखता हूँ.. उनके हिसाब से मुझे और भी मुद्दे पकड़ने चाहिए और उन पर लिखना चाहिए.. और धर्मों की भी बुराईयाँ करनी चाहिए.. सबको कोसना चाहिए.. सिर्फ़ इस्लामिक कट्टरपंथियों को नहीं

आज जो सब बलात्कार के लिए बुक्का फाड़ फाड़ के रो रहे हैं उनसे पूछिए कि कितने दिन ये रोयेंगे? बस हद से हद दो हफ्ते.. या एक महीना बस.. इसके बाद ये बोर हो जाते हैं.. फिर इन्हें दूसरे मुद्दे चाहिए होते हैं रोने और क्रांति के लिए.. इन्हें हमेशा से लगता है कि चार दिन में जो इन्होने लिखा है फेसबुक और ट्विटर पर उस से बलात्कारी समझ जायेंगे और बलात्कार थम जायेंगे.. इन्हें लगता है कि इनके चार पांच इमोशनल लेख से समाज पलट जाएगा.. ये ऐसा कर के अपनी ज़िम्मेदारी से निजात पा लेते हैं और दुसरे मुद्दों की तलाश में आगे बढ़ जाते हैं

दरअसल न तो किसी को बलात्कार ख़त्म करना है और न आतंकवाद.. न किसी को ग़रीबी ख़त्म करनी है और न जाहिलियत.. न कोई भी भ्रष्टाचार ख़त्म करने के मूड में है और न ही किसी को क्रिमिनल बुरे लगते हैं.. ये सब मुद्दे हैं.. और ये मुद्दे मुर्दों के नसों में खून की रवानी तेज़ कर देते हैं.. कभी देखा है आपने कि कहीं दो देशों के बीच युद्ध हो जाए तो यहाँ लोगों की नसें फड़कने लगती है? वो ख़बरों से चिपक जाते हैं.. ये उनके लिए एक मैच जैसा होता है.. ये जानना होता है कि कौन हारेगा और कौन जीतेगा.. एक को ओवैसी बुरे लगते हैं मगर प्रज्ञा और गोडसे हुतात्मा.. एक को मोदी से नफ़रत है तो खलीफाओं से मुहब्बत.. और दोनों इंसानियत और भाईचारे की दुहाई देते आपको फेसबुक पर मिलते हैं.. ऐसे ही बलात्कार के ऊपर भी रोने वाले हैं.. इधर रोयेंगे उधर कोई विडियो भेज दे बलात्कार का तो देखने के लिए बाथरूम में घुस जायेंगे

मेरे दोस्त हैं राकेश भाई.. उन्होंने अपनी पूरी उम्र इस मुद्दे पर निछावर कर दी है.. दसियों साल से वो गाँव गाँव घूम रहे हैं.. स्कूल कॉलेज में लड़कों से वार्तालाप करते हैं.. और उन्हें समझाने और जागरूक करने का प्रयास करते हैं.. बलात्कार पर ऐसे विजय पायी जायेगी जैसे राकेश भाई काम करते हैं.. सिर्फ़ एक राजाराम मोहन राय आते हैं और सदियों से चली आ रही सती प्रथा पर अकेले लगाम लगा देते हैं.. क्यूंकि वो जुट जाते हैं जी जान से उस पर.. सती प्रथा उनके लिए एक मुद्दा नहीं था और न उन्हें दुनिया के और किसी मुद्दे में इंटरेस्ट था.. उन्होंने समाज की एक बुराई पकड़ी और उसे मिटा दिया

यहाँ अब सबको पत्रकार बनना है.. ज्यादा से जाया मुद्दों पर लिखना है.. और लिख कर भूल जाना है.. इसलिए मुझे अब फेसबुक पर ज़्यादातर लोग, चाहे कोई सेक्युलर हो या नास्तिक, सब एक जैसे लगते हैं.. सबको मुद्दे चाहिए.. आप एक मुद्दे के लिए सारी उम्र लड़ोगे तो आपको सब छोड़ देंगे.. क्यूंकि इन्हें रोज़ नया सेंसेशन चाहिए.. खून में रवानी के लिए रोज़ नयी घटना चाहिए. आपका रोज़ एक ही मुद्दा इन्हें बोर करने लगता है

बलात्कार जब तक एक “घटना” रहेगी तब तक इसका कुछ नहीं होने वाला है.. आतंकवाद जब तक एक घटना होगी तब तक इसका कुछ नहीं होगा.. मोब लिंचिंग जब तक “घटना” रह्र्गी इसका कोई हल नहीं होगा.. आप इन घटनाओं पर लिखेंगे.. क्रांति करेंगे और सो जायेंगे

बलात्कारी, आतंकवादी, उग्रवादी.. सब हमारे घरों से ही निकलते हैं.. ये हमारे और आपके बच्चे हैं और इसी समाज का हिस्सा हैं.. आप आतंकियों को संसद में चुन कर भेजते हैं, आप आतंकियों को रह्मौतुल्लाह अलयेह बोलते हैं, फिर दूसरी तरफ़ आतंकवाद ख़त्म करने के लिए भावनात्मक लेख भी लिखते हैं.. ऐसे आतंकवाद ख़त्म करते हैं आप.. आप छंटे हुवे क्रिमिनल लोगों को चाणक्य, संत, औलिया और साध्वी बोलते हैं और उनका महिमामंडन करते हैं फिर लेख लिखते हैं कि हमारे समाज के नौजवानों का नैतिक पतन हो गया है.. आप चाहते हैं कि जिस वर्ग को आप समाज में पसंद नहीं करते हैं आपकी चुनी सरकार किसी भी हद तक जा कर उन्हें मिटा दे.. फिर आप दूसरे देशों में रह रहे अपने “पसंदीदा वर्ग” पर हुवे ज़ुल्मों के लिए मानवाधिकार की दुहाई देते हैं और उस पर लेख लिखते हैं. क्रांति करते हैं.. आग बबूला होते हैं और फिर भूल जाते हैं

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क्रान्ति न्यूज - भ्रष्टाचार के खिलाफ क्रांति की मशाल