बौद्ध धर्म में न कोई भगवान हैं और न कोई कर्मकांड — …..

कवि अनिरुद्ध कुमार सिंह…
विजय नगर, गाजियाबाद । आज दिनांक-13 /11/2019,समय–लगभग दो वजे के करीब अपराह्न में भीम नगर,विजय नगर बाई पास रोड,गली नंबर-7, विजय नगर थानांतर्गत स्थित श्री वीरेन्द्र पाल जी के साथ उनके मेडिकल स्टोर के दुकान पर कुछ महत्वपूर्ण बातचीत हुई, जो निम्नलिखित हैं ……………………….
कवि अनिरुद्ध कुमार सिंह–कोई भी सफलता भगवान के बिना प्राप्त नहीं हो सकता है । कोई भी विभाग में सफलता तब मिलते हैं,जब कोई भगवान के नाम लेते हुए कर्म करते हैं। भगवान के नाम लिए बिना लक्ष्य की प्राप्ति अधूरी रह जाती है। किसी को सफलता तब मिलते हैं जब कोई काम करते समय भगवान के नाम को सुमिरन करते हों । इसलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा था कि–कर से काम करो विधि नाना,मन रखो जहां किरपा निधाना । अर्थात अपने हाथों से अनेकों कर्म करते रहना चाहिए, किंतु अपना मन दया के सागर पर रखना चाहिए । दूसरी ओर भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा था कि–‘मम समरणं युद्धम कुरू अर्थात मेरा स्मरण करते हुए युद्ध (कर्म) करो ।
उपरोक्त बातों से ज्ञात होता है कि भगवान को नाम लिए बिना सिर्फ कर्म करने से सफलता नहीं मिलती हैं । इसलिए भक्तगण भगवान के नाम लेकर ही कोई कार्य को शुभारंभ करते हैं । तभी वो अपने जीवन में सफल होते हैं ।

वीरेन्द्र पाल–नही, मैं लक्ष्य प्राप्ति के लिए भगवान का नाम लेना नहीं चाहता हूं। कोई भी सफलता भगवान के नाम लिए बिना ही प्राप्त होता है । भगवान के नाम लेने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता है, वल्कि जो कर्म करेगा,फल उसे प्राप्त होता है । इसलिए मनुष्य को सिर्फ कर्म करते रहना चाहिए । कर्म करने से सब कुछ प्राप्त होता है ।………………..
कवि अनिरुद्ध कुमार सिंह–अगर कर्म करने से सब कुछ प्राप्त होते हैं, तो सबसे ज्यादा कर्म मजदूर वर्ग के लोग करते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा कर्म करने के बाद भी वे कम परिश्रम करने वाले के अपेक्षा गरीब क्यों होते हैं ? पशुओं में भी सबसे ज़्यादा मेहनत गधा करते हैं, लेकिन कम मेहनत करने वाले घोड़े को सबसे ज्यादा मान -सम्मान मिलते हैं और खाना भी उसे अच्छा मिलता है ।..
प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जी लोकसभा के चुनाव एक बार भी नहीं जीत पाये और भारत के दस वर्ष प्रधानमंत्री मंत्री रह चुके हैं । दूसरी तरफ हम देखते हैं कि बी.जे. पी. के वरिष्ठ नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी जी अनेकों बार लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे, फिर भी वे भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन पाये । ऐसा क्यों हुआ ? श्री लालकृष्ण आडवाणी जी अंत समय में श्री राम जी के जगह पर पाकिस्तान में जाकर मोहम्मद अली जिन्ना के नाम याद करने लगे थे । इसलिए वे भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन पाये । जबकि श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी श्री राम के नाम को कभी भी नही भूले, जिसके कारण वे भारत के दस वर्ष प्रधानमंत्री पद पर बने रहेंगे । अतः कर्म करने के साथ-साथ भगवान के नाम लेना आवश्यक है । गोस्वामी तुलसीदास जी कहते थे कि ‘प्रवेश नगर कीजे सब काजा, ह्रदय राखों कोसलपुर राजा । अर्थात किसी भी नगर में रहिए, किंतु ह्रदय में श्री राम जी के नाम अवश्य रखिए । गोस्वामी तुलसीदास जी यह भी कहते थे कि-आगम- निगम पुराण अनेका, पढ़े-लिखे का फल प्रभु एका । तब पद पंकज प्रीति निरन्तर,सब साधन कर यह फल सुंदर । अर्थात भगवान के चरण कमलों में हमेशा प्रीति बनाते हुए काज करना चाहिए । यहां भी भगवान के नाम लेते हुए कर्म करते रहने के उपदेश गोस्वामी तुलसीदास जी ने दिए हैं । श्री वीरेन्द्र पाल……. नहीं, मैं कर्म को श्रेष्ठ मानता हूं । इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है ।………………….
कवि अनिरुद्ध कुमार सिंह–लेकिन आप तो कर्म से ज्यादा कर्मकांड करते हैं । आप बताइए कि जब कर्म श्रेष्ठ है तो कर्म- कांड क्यों करते हैं? आप अपने दुकान पर भगवान का पूजा क्यों करते हैं? आप दाहिने हाथ की कलाई में लाल रंग की धागा क्यों बांध रखे हैं? जब कर्म श्रेष्ठ है तो कर्मकांड करते हीं क्यों हैं? शास्त्र में कहा गया है कि’ नाना शास्त्र पठेन लोके, नाना देव पूजनम, आत्म ज्ञान बिना पारथम, सर्वम कर्मम निरथकम । अर्थात अनेकों शास्त्र को पढ़ने और अनेकों प्रकार के देवता पूजने से सभी कर्म निर्थक हो जाते हैं, जबतक कि आप आत्म ज्ञान नहीं प्राप्त कर लेते हैं । आप अब यह बताइए कि आप कर्मकांड करते हैं या नहीं? ….

श्री वीरेन्द्र पाल—-हां ,मैं कर्मकांड करता हूं ।..
कवि अनिरुद्ध कुमार सिंह–अभी आप कुछ समय पहले सिर्फ कर्म को श्रेष्ठ मान रहे थे, लेकिन अब आप कर्मकांड क्यों करते हैं? आप के कथनी-करनी में आसमान और जमीन का अंतर है। आप एक निश्चित विचार पर नहीं चलते हैं । आप जब कर्म और कर्मकांड में अंतर हीं नहीं समझते हैं, तो आप मुझसे बहस क्या करेंगे? आपको यह भी पता नहीं है कि सबसे बड़ी विवेक होता है, विवेक से कर्म पैदा होता है और कर्म से आदमी महान् होते हैं। लेकिन आप तो बात करते हैं कर्म का और करते हैं कर्मकांड ।जो ब्यक्ति कर्मकांड करते हैं,वो ब्यक्ति सबसे घटिया होता है । जैसे जो आदमी भगवान् शंकर जी पर दूध चढ़ाते हैं, तो यह हुआ कर्मकांड, लेकिन जो आदमी किसी को दूध पिलाया है तो यह हुआ कर्म । कर्म ही धर्म है और कर्मकांड हीं अधर्म है । अतः कर्म ,कर्मकांड से श्रेष्ठ है। इसलिए आप दोनों मार्ग पर नहीं चलिए । आप चाहें तो कर्म पर चलिए या तो कर्मकांड पर । कर्मकांड में कर्म नहीं होता है, लेकिन कर्म में सिर्फ कर्म होते हैं । लेकिन कोई भी कर्म भगवान को सुमिरन करते हुए करने से सफलता मिलना निश्चित है । जैसे विभीषण जी श्री राम भगवान के नाम सुमिरन करते थे तो लंका के राजा बन गये । लेकिन पापी रावण श्रो राम जी के नाम का विरोध किया करते थे , जिससे उसका सर्वनाश हो गया । उसके मरने पर कोई आंसू बहाने बाला भी नहीं मिला । अतः सफलता भगवान की कृपा करने और कर्म करने से मिलता है। लेकिन आप कहते हैं कि भगवान की कृपा से सफलता नहीं मिलती हैं, तो यह आपका विचार है, जिससे मैं सहमत नहीं हूं। अतः आप कर्म काण्ड को क्यों करते हैं?…..
श्रो वीरेन्द्र पाल…. कर्मकांड समाज को दिखाने के लिए करता हूं। अगर मैं समाज में कर्मकांड करके नहीं दिखाउंगा, तो हिन्दू कैसे कहलाऊंगा ?……

कवि अनिरुद्ध कुमार सिंह—जब आप भगवान को नहीं मानते हैं, तो आप कर्मकांड क्यों करते हैं? आप जैसे भगवान को नहीं मानते हैं, वैसे ही कर्मकांड को भी मत मानिए । लेकिन आप कर्मकांड को आप छोड़ना नहीं चाहते क्योंकि आप हिन्दू बनें रहना चाहते हैं । आप हिन्दू क्यों बना रहना चाहते हैं?इस धर्म से बढ़िया है कि आप बौद्ध धर्म ग्रहण कर लीजिए । आप को बौद्ध धर्म अपनाने से फायदा है क्योंकि यहां न कोई भगवान हैं और न ही कोई कर्मकांड । आपको अब नमो बुद्धाय कहना सही है क्योंकि आप गौतम बुद्ध के विचारों को मानते हैं । जय श्री राम,जय जय जय श्री राम ।

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