उत्तर प्रदेश में राजनेताओं तथा सरकारी महकमें पर 13 हजार करोण बिजली का बिल बकाया?*

भरष्टाचार मुक्त समाज का दावा करने वाली सरकार के बिधायक मन्त्री देश का कर रहे है दिवाला ?


सम्पादकीय *अजय ठाकुर *

गरीबी लाचारी महामारी तमाम तरह की बिसंगतीयो के साये में रोजाना पैदा हो रही बिमारी से त्रस्त आम आदमी सिसक सिसक कर जी रहा है। मुश्किल से दो जून की रोटी का जुगाङ बना पा रहा है किसान कामगार? उस पर तूर्रा यह की कुछ सौ रूपये बिजली का बकाया हो गया तो जेल जुर्माना वसूली मनमाना के साथ ही मुकदमा लिख देता है थाना?।तबाही के रास्ते पर खङा है देश का अन्नदाता समय से बिजली नहीं पानी नहीं खाद नहीं फसल तैयार हुयी तो प्राकृतिक आपदा का शिकार होकर भुखमरी के कगार पर पहुंच कर मौत को गले लगाने को मजबूर हो जाता है। लेकीन इस देश के सियासत दार जो आलिशान बँगले में रहते है महंगी गाङीयो में चलते है उनके उपर कोई कानून लागू नहीं होता? बिजली बिल पानी इन्कम टैक्स कभी जमा नहीं करते? चौबीस घन्टे बिजली का उपयोग करते है। खुद कानून बनाते है। खुद ही मजाक बन जाते है। देश के सियासत दारो से लेकर सरकारी अफसरानो के नाम बर्तमान समय मे 13हजार करोण रूपये की बिल बिजली बिभाग का बकाया है।न उनकी बिजली कटती है न आरसी कटती है। न वसूली होती है? ब्यवस्था रास्ता बदल देती है।आम आदमी हताश है निराश है।आज कल उत्तर प्रदेश की सियासत में सराफत की चादर ओढ कर भर्ष्टाचार भयमुक्त समाज का नारा देने वाले ढपोर शंखी सियासतदारो के कालिख पुते चेहरे जांच के आइने में साफ नजर आने लगें है। उत्तरप्रदेश सरकार की कैबीनेट व पुलिस बिभाग सहित आधा दर्जन सरकारी बिभाग में दो साल के अन्दर साढे चार सौ करोण बिजली की बिल बकाया कर गयी दो साल पहले साढे नौ सौ करोण बिजली की बिल बाकी थी।योगी सरकार में भी भरष्टाचारी दुराचारी ब्यबिचारी आनाचारीयो के साथ महकमा सरकारी भी बेलगाम हो गया है।
समरथ को नही दोष गोसाई वाली बात इस सरकार मे खूब चरितार्थ हो रही है।दर्द से कराहती आम पब्लिक कुछ हजार बकाया बिजली बिल पर आरसी का दंश झेल रही है। वहीँ बङे बकायेदार मलाई काट रहे है।
इस प्रदेश में सियासत की दोगली निति के चलते ही गरीबों कीआह, किसानो की परवाह, ब्यापारीयो की चाह, को कोई देखने समझने वाला नही है। ब्यस्था के समन्दर में भयंकर उथल पुथल चल रहा है। गरीब तबाही के दौर से गजर रहा है। बलशाली कब्बाली गा रहा है।जनमानस की जिन्दगी में केवल अमावस हीअमावस की भरंकर कालिमा लिये सियासी रात है। वहीं इस देश की सियासतदार मालदार कानुन के पहरेदारो के लिये ब्यवस्था का रास्ता आनन्द से भरा हुआ है? ब्यवस्था उनके पाँव पखारती है? तो कानुन पाँव के नीचे से गुजरता है? इन्ही के अनुमति से इस देश की सियासी नदी प्रवहमान होती है। इन्ही के मर्जी से इस देश तापमान घटता बढता है।अरबो अरबो के घोटाले पर ससरकार की जबान पर ताले है?यही धेश के रखवाले है। जिनके पास खाने का ठीकाना नही ,रहने का जुगाङ नही, उन्ही के साथ कानुन खिलवाङ करता है। मेहनत कसो की कमाई पर शहंशाही जिन्दगी बशर करने वाले बेशर्म सियासतदार सारी सुख सुविधाओं का भोग करते हुये भी ब्यवस्था को चूना लगा रहें है।बिजली बिभाग असहाय बना हुआ है।आम आदमी का दस हजार बकाया हो गया तो लाल नोटीस तत्काल बिजली काट दी जाती है। मुकदमा कायम कर जेल भेज दिया जाता है। वहीं करोणों के बकायेदार शान से सियासी दुकान चला रहें है। आफशरशाह मुस्करा रहें है।सरकार सुविधाओं का सारा भंङार उन्ही के लिये खोल रखा है सरकार चाहे जिसकी हो बर्बादी का रस्ता तो केवल गांव गिराव खेत खलिहान दूकान सिवान से ही गुजरता है। बिजली बिल में 12 प्रथिशत की बढ़ोत्तरी का सीधा असर आम पब्लिक पर पङ रहा है जो ईमानदारी से अपनी कमाई का हिस्सा सरकारी खजाने मे जमा करते रहते है वहीं उन सियासी लूटेरों पर कोई असर नहीं जो दिन दित रात घोटालों की ईबारत लिखते रहते है।इस देश के गरीबो का खून चुसते है। सरकार भी उनपर मेहरबान है बस सबसे बङा अपराधी तो इस देश का कीसान है।जो दिन रात अपनी मेहनत से अन्न पैदा कर सबकी जिन्दगी सलामत रखता है खुद कर्ज के मर्ज से तङप तङप कर दम तोङ देता है। आखिर कब तक चलेगी इस देश मे दो तरह की ब्यवस्था ? सीमा पर कुर्बान होगा जवान ?खेत मे मरेगा कीसान? और सियासत कि रंगीन दुनियाँ मे बैठे बेईमान सारी कमाई लूट कर चला रहे हैअपनी सियासत की दुकान? सरकार बदली लगा ब्यवस्था बदल जायेगी गांव गिराव की स्थिति सम्हल जायेगी? शहर बाजार गली मुहल्ला सुधर जायेगा? मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सब कुछ यथावत रहा ।हर तरफ होता बगावत रहा। फीर भी कायम भ्रष्टाचारियों रवायत रहा ।
बर्बादे गुलिस्ता करने को बस एक ही ऊल्लू काफी था अब हर शाख पर ऊल्लू बैठै है अन्जामे गुलिस्ता क्या होगा?
जिस तरह की ब्यवसाथा चल रही है लोगों की आस्था बदल रही है। इससे तो साफ दिख रहा है आने वाले कल में दर्द की सुलग रही ज्वाला मुखी मौका पाते ही निश्चित रूप बिस्फोट करेगी? बस समय का इन्तजार करें? देखते जाईये मुहब्बत देश से करतें है चौकीदार या देश को लूट कर बनते रहते है मालदार?भरोशा टूट रहा है जनमानस का चाहे किसी की हो सरकार? नग्न ताङंव कर रहा है भरषाटाचार?हर तरफ मच गया है हाहाकार सच लिखने से भी मुँह मोङ रही है कलम उसे पता है अन्जाम बुरा होगा आजकल खतरे मे है पत्रकार?
जय हिन्द*

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