रामानुज मठ, गया (बिहार) से लापता लड़के को भरथरी साधू बनाये जाते हैं ।- इस समाचार का छठवां भाग यहां से पढ़िए ——-

सबसे बांयी तरफ साधू दिलीप सिंह एवं उनके दायीं तरफ के दूसरी फोटो के बाद बड़े भाई कवि अनिरुद्ध कुमार सिंह मगध साहित्यकार पत्रकार संघ के बैठक में उपस्थित

मैंने ‌सन 1992 -93 में हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन ,गया (बिहार) में मगध साहित्यकार पत्रकार संघ का स्थापना किया था । मैं इस संघ का महासचिव के पद पर चुना गया था । इस संघ के आयोजित सभा में दिलीप सिंह के साथ मैं भी मंच पर उपस्थित था । इस संबंध में दैनिक पत्र जैसे हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, नवभारत टाइम्स,जन शक्ति और स्थानीय सप्ताहिक समाचार पत्र मगध धरती में समाचार प्रकाशित किए गए थे । इसके बाद मैं खुशी से गया स्थित विष्णु पत मंदिर में दर्शन करने गया था । तत्पश्चात मैं रामानुज मठ, गया में दर्शन करने गया था , जहां मुझे देवनारायण आचार्य जी से संपर्क हुआ था । इस बात का चर्चा मैंने अपने से छोटे दोनों भाइयों के सामने किया था । इसके बाद मेरे दोनों भाइयों ने भी रामानुज मठ दर्शन करने की इच्छा जताये थे । तब मैं उनके मन के शांति के लिए रामानुज मठ,गया में अवध सिंह और दिलीप सिंह को लेकर गया था , जहां स्वामी देवनारायण आचार्य जी से मेरे दोनों भाइयों के संपर्क हुए थे । मुझे देव नारायण आचार्य से तीन-चार बार बातचीत हुए थे । बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे भी अपने साथ बाहर ले जाने की इच्छा जताये थे । वे मुझसे कहते थे कि मैं यज्ञ कराता हूं, जिसमें आपके सहयोग की आवश्यकता है । लेकिन मैं उनसे साफ – साफ़ कहा कि यज्ञ में मुझे क्या काम करना है ? मुझे कर्मकांड में कोई रूचि नहीं है ।मैं भगवान के सामने कोई दिखावा नहीं करता हूं । मुझे भगवान् पर भरोसा है, किंतु आप ‌पर नहीं ? मुझे पता नहीं है कि आप बाहर ले जाकर क्या करेंगे ? हम कोई कार्य भावना में बहकर नहीं करते हैं । मैं सोच-विचार कर कोई कार्य करता हूं । मैं आपके साथ बाहर नहीं जाउंगा ,क्योंकि मुझे बाहरी बनाबट करने वाले के साथ रहना अच्छा नहीं लगता है । इस बात को सुनकर श्री देवनारायण आचार्य जी गुस्से में हो गये थे ।वे मुझसे काफी नाराज़ हो रहे थे । तब मैंने कहा कि आप दुर्वासा ऋषि मत बनिए । संत के ह्रदय नवनीत के समान होता है । गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं बूंद आघात सहहिं गिरि कैसे, खल के वचन संत सह जैसे ? लेकिन आप तो संत हैं हीं नहीं, इसलिए आपको गुस्सा ज्यादा आते हैं । यह आपका संत स्वभाव नहीं है ।चाहे आप कुछ भी कर लें, मैं आपके साथ नहीं जाउंगा । इतना कहकर मैं मठ से बाहर निकल गया ।- आगे का समाचार सातवें भाग में पढ़िए —————————-

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