………पूजहि विप्र गुण शील हीना………

(कवि अनिरुद्ध कुमार सिंह.के द्वारा):- आप सभी जानते हैं कि श्री रामजी गुणों के आधार थे ।… उनमें लेश मात्र भी अवगुण नहीं थे । लेकिन पाखंडियों ने उनके गुणों से जलने लगे थे।इस कारण से श्री रामचरित मानस में श्री राम जी के विचारों को उल्टा लिखकर चुपके से शामिल कर दिए ।

मैं पूछना चाहता हूं कि जब श्री राम जी जाति को नहीं मानकर सिर्फ गुणों के आदर करते थे, तब श्री रामचरित मानस में किसने लिखा :–
पूजहि विप्र गुण शील हीना, शुद्र न पुजहिं गुण ज्ञान प्रविना।
अर्थात ब्रह्मण चाहे गुण एवं शील से हीन हो, फिर भी वह पूजने के योग्य हैं, लेकिन शुद्र गुण एवं शील से भरपूर हो, लेकिन वह पुजा के पात्र नहीं होंगे । क्या ऐसी बात श्री राम जी कह सकते थे? मुझे तो दिल से इस चौपाई पर विश्वास नहीं है ।
जो मानव श्री राम जी के विरोधी थे,उसी ने उनके खिलाफ यह चौपाई लिखकर उनको वदनाम करने के लिए साजिश किए हैं। पाठकों से मेरा अनुरोध है कि इस बात पर ध्यान नही दें क्योंकि यह बात श्री राम जी ने नहीं कहा था।यह बात सिर्फ रावण समर्थक के आदमी ने श्री राम को गलत बताने के लिए जलन के भावना से ग्रसित हो कर लिखा है। अतः इन बातों पर आप बिल्कुल भी ध्यान नहीं दें और जिसको भी यह चौपाई पढ़ने को मिले, वे सब इसे असत्य मानें ।

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